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Tuesday, March 24, 2015

Varsha Sameer (Barsaat ki aati hava)


वर्षा समीर
- हरिवंश राय बच्चन (सतरंगिनी से)

बरसात की आती हवा।

वर्षा-धुले आकाश से,
या चन्द्रमा के पास से,
या बादलों की साँस से;
        मधु-सिक्त, मदमाती हवा,
        बरसात की आती हवा।

यह खेलती है ढाल से,
ऊँचे शिखर के भाल से,
आकाश से, पाताल से,
        झकझोर-लहराती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह खेलती है सर-वारि से,
नद-निर्झरों की धार से,
इस पार से, उस पार से,
        झुक-झूम बल खाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह खेलती तरुमाल से,
यह खेलती हर डाल से,
लोनी लता के जाल से,
        अठखेल-इठलाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

इसकी सहेली है पिकी,
इसकी सहेली चातकी,
संगिन शिखिन, संगी शिखी,
        यह नाचती-गाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

रँगती  कभी यह इन्द्रधनु,
रँगती  कभी यह चन्द्रधनु,
अब पीत घन, अब रक्त घन,
        रँगरेल-रँगराती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह गुदगुदाती देह को,
शीतल बनती गेह को,
फिर से जगाती नेह को;
        उल्लास बरसाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह शून्य से होकर प्रकट,
नव हर्ष से आगे झपट;
हर अंग से जाती लिपट,
        आनंद सरसाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

जब ग्रीष्म में ये जल चुकी,
जब खा अंगार-अनल चुकी,
जब आग में यह पल चुकी,
        वरदान यह पाती हवा;
        बरसात की आती हवा।


तू भी विरह में दह चुका ,
तू भी दुखों को सह चुका,
दुःख की कहानी कह चुका,
        मुझसे बता जाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

I had read this poem long time back in school, but it used to be titled 'Barsaat ki aati hawa' (or at least that is what I remember). I had been searching for this poem far and wide, for years and years. After several years, I came to know that this is from the collection 'Satrangini'.  But still could not find it in the online poetry sites, though they had some other poems from this collection. At last, I managed to locate a copy in the library, though in another branch; and after waiting in anticipation for several days, I was finally able to savor this lovely poem again :).

Thursday, December 27, 2012

Jo Beet Gayi, So Baat Gayi

Bachchan is one of the most prolific poets I have read, and many (or perhaps most!) of his poems have a beautiful, lyrical, almost song-like quality. While poems written in one phase of his life demonstrate a lost hope, another phase echoes finding that hope again. Posting a beautiful song of this hope, that we came across in school many years ago ....
जो बीत गई सो बात गई
  - हरिवंश राय बच्चन 

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गय
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूट
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है

जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई

Tuesday, September 11, 2012

Maine Shanti Nahin Jaani Hai

Came across this beautiful poem, for the first time, on Amitabh Bachhan's FB page.

मैंने शांति नहीं जानी है!
  - हरिवंश राय बच्चन 


मैंने शांति नहीं जानी है!

त्रुटि कुछ है मेरे अन्दर भी,
त्रुटि कुछ है मेरे बाहर भी,
दोनों को त्रुटि हीन बनाने की मैंने मन में ठानी है!
मैंने शांति नहीं जानी है!

आयु बिता दी यत्नों में लग,
उसी जगह मैं, उसी जगह जग,
कभी-कभी सोचा करता अब, क्या मैंने की नादानी है?
मैंने शांति नहीं जानी है!

पर निराश होऊं किस कारण,
क्या पर्याप्त नहीं आश्वासन?
दुनिया से मानी, अपने से मैंने हार नहीं मानी है!
मैंने शांति नहीं जानी है!

Tuesday, April 17, 2012

Mera Sambal

It is quite a surprise that with all the poems that I have been posting, I have not yet come around to post anything by Bachchan. The first poem I am about to share is something I have always found rather special - its a short, crisp verse, somewhat different from his usual, verbose, song-like style (I love those too!), voicing eternal hope.
मेरा संबल 
  - हरिवंश राय बच्चन 
 
मैं जीवन की हर हल चल में
कुछ पल सुखमय
अमरण अक्षय
चुन लेता हूँ

मैं जग के हर कोलाहल में
कुछ स्वर मधुमय
उन्मुक्त अभय
सुन लेता हूँ

हर काल कठिन के बन्धन से
ले तार तरल
कुछ मुद मंगल
मैं सुधि पट पर
बुन लेता हूँ।